जीवनपथ पर आज फिर हुई है मुलाक़ात
अपनी रूठी हुई तक़दीर से
की आज फिर रूबरू हुई है नज़रें,
उसी भूली हुई तस्वीर से।
अश्रुओं में भिगोकर गढ़ी थी जो,
ये वही जाना पहचाना सा प्रतिमान है,
अन्तःकरण की तह तक घर करनेवाला,
मेरे जीवन का ये एक अनचाहा सा कीर्तिमान है।
इस कीर्तिमान के खयाल से, अनजान हुआ है ये चित्त बामुश्किल कायम उस धीर से,
की आज फिर रूबरू हुई है नज़रें, उसी भूली हुई तस्वीर से।
सोचा था की न सोचेंगे कभी,
तवक्कों के उस टूटे हुए अर्श को,
पर शायद इन पगों को गवारा नहीं,
की भूलू कभी इकतरफा राब्ता की इस फर्श को।
एक अजनबी सी कशिश बंधी है, अब तो माजी के उस मीर से,
की आज फिर रूबरू हुई है नज़रें, उसी भूली हुई तस्वीर से।
गुजारिश है इन भूली हुई यादो से,
की अब तोे मेरे पास ना आओ,
संभाला हू काफी शिद्दत से,
अब तो मुझे न गिराओ।
खत्म करो अब तो ये मसला, क्यों मिलवा जाते हो अक्सर गुजरे हुए उस पीर से,
की आज फिर रूबरू हुई है नज़रें, उसी भूली हुई तस्वीर से।