पहाड़ों की खामोशी

सपनों से थकी हुई ये खामोश आंखें भी,
कभी कभी दास्ताने मोहब्बत बयां करती है,
की जब भी कभी पहाड़ों की वो सुंदर सी खामोशी,
मेरे खाली मन से कुछ कम दरमियान करती है।

खामोशी ऐसी की जो,
एक ठहरी हुई हलचल को जगा दे,
और आगोश ऐसा की जो,
बस एक खोया सा एहसास वापस दिला दे,

इसी आगोश में लिपटी एक खुशी, अक्सर मेरे होठों से इत्तेफाक  करती है,
की जब भी कभी पहाड़ों की वो सुंदर सी खामोशी, मेरे खाली मन से कुछ कम दरमियान करती है।

कोशिश करता हु जब भी,
इन पहाड़ों की हवायों को गले से लगाने की,
एक अजनबी सी उमंग उठती है,
किसी अनजान से अपने के आने की

ना जाने क्यों ये अजनबी सी उमंग, मेरे गहरे लेश को गुमनाम करती है,
की जब भी कभी पहाड़ों की वो सुंदर सी खामोशी, मेरे खाली मन से कुछ कम दरमियान करती है।

किसी चेहरे से हुई थी जो,
वो तो बस एक मोहब्बत है,
इन पहाड़ों से हुई है जो,
वो तो एक इबादत है

इसी इबादत को निभाने की खातिर, मेरी आंखे उस चेहरे से भी फासला करती है,
की जब भी कभी पहाड़ों की वो सुंदर सी खामोशी, मेरे खाली मन से कुछ कम दरमियान करती है।


Published by chintamani shukla

CA by profession and a Poet by passion

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