मुस्कुराता हुआ गुलदस्ता

शायद किसी ताबीर की,
परछाई से होगी उसकी वाबस्ता,
एक चेहरा है वो जैसे मानो,
मुस्कुराता हुआ कोई गुलदस्ता।

बांतों की कतार तो मानो,
जैसे खत्म होने का नाम नहीं लेती,
लेकिन उसकी बांतों के बिना,
ये हंसी भी खुशी का अंजाम नहीं लेती।

उसकी बांते भी हो मासूमियत का, जैसे एक भरा हुआ बस्ता,
एक चेहरा है वो जैसे मानो, मुस्कुराता हुआ कोई गुलदस्ता।

रूठ जाए अक्सर मुह फुलाये,
मेरे व्यंग की हर इक तार पे,
लेकिन झटपट मान भी जाए,
जब कहूं की ना होगा ऐसा अब अगली बार से,

व्यंग की तर्ज पर उस मासूम रुकसाई को सोच,
कुछ पल तक मैं रहता हु हंसता,
एक चेहरा है वो जैसे मानो, मुस्कुराता हुआ कोई गुलदस्ता।

बीते कुछ गुमनाम पहर में,
उसी ने मेरे होठों पे ये हँसी मुक्कमल की है,
इसीलिए इस लेखनी से निकले,
आज ये सारे शब्द भी मैने नाम उसी के दाखिल की है।

है इज़हार की उसके इस भोले साथ को, मैं कभी नहीं भुला सकता,
एक चेहरा है वो जैसे मानो, मुस्कुराता हुआ कोई गुलदस्ता।

Published by chintamani shukla

CA by profession and a Poet by passion

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