रात सितारों की

क्यों जगती है एक अजनबी सी उम्मीद,
महसूस कर अस्तित्व तिमिर के इन नजारों की,
की हो भले कितनी ही अंधेरी,
है रात तो ये सितारों की।

माना की उस शाम की रोशनी के,
मेरे आगे हकदार कई है,
लेकिन सफेद चांदनी को ओढ़े,
इस खाली राह में अब तो कोई पथकार नहीं है

की है भले सफर का ये समय लंबा, लेकिन दिखेगी उस पार कभी तो एक झलक सपनों के उन मजारों की,
की हो भले कितनी ही अंधेरी, है रात तो ये सितारों की।

कहने को तो ये तिमिर मिला है,
मेरी मंजिल के दर्पण पर एक हिजाब सा,
न जाने क्यों लगता है फिर भी,
अंधेरों का ये दहर एक साथी है लाजवाब सा,

शायद अब इस साथी को पाकर, खत्म हुई है गुँजाइश सभी दरकारों की,
की हो भले कितनी ही अंधेरी, है रात तो ये सितारों की।

रहेगी कसक हमेशा कुछ कम पाने की,
ये इस साथी ने सिखलाया है,
आखिरकार चाँद में छुपे उस दाग को भी,
इसी रात ने दिखलाया है,

बयां की है सार्थकता इसी रात ने, जुगनू द्वारा फैलाये गए इस उजियारे की,
की हो भले कितनी ही अंधेरी, है रात तो ये सितारों की।




Published by chintamani shukla

CA by profession and a Poet by passion

Leave a comment

Design a site like this with WordPress.com
Get started