बंद कर अपनी आगोश में,
खामोश पीर के कई अनगिनत पहरे,
जीने का एक सलीका सीखलातीं हैं,
समंदर की ये हंसती हुई लहरें।
बाहरी स्वरूप से लगती है ये,
अशांत जल का एक समूह,
भीतरी रूह में तो इनकी भी होती होगी,
खामोश हलचल से निरंतर एक गुफ़्तगू।
आज इस गुफ़्तगू पर सोचा तो ये पाया, की घाव संघर्ष के है इनके भी उतने ही गहरे,
की जीने का एक सलीका सीखलातीं हैं, समंदर की ये हंसती हुई लहरें।
जुझकर पत्थरों से उस साहिल तक
इन्होंने अपना रास्ता खुद बनाया है,
भुलाकर अनचाहे पड़ावों को,
जीवनपथ पर हंसना इन्ही ने सीखाया है,
कहने को तो दर्शाती है ये भी प्राकृत का एक दस्तूर,
ना जाने छिपे हैं जिसमे कई अजनबी से चेहरे,
और जीने का एक सलीका सीखलातीं हैं,
समंदर की ये हंसती हुई लहरें।
अपने जीवन और ख्वाब की कठिन दूरी पर,
हो व्याकुल जब भी मेरे आस का दिया डगमगाता है,
इन्तेजार तो है हर किसी का मुक़्क़द्दर,
ये बात आकर साहिल मेरे कानो में अक्सर कह जाता है
हो इन्तेजार कितना ही लंबा, गीत मधुर गाती हुई खाती है निरंतर ये मस्ती की हिल्लोरे
की जीने का एक सलीका सीखलातीं हैं, समंदर की ये हंसती हुई लहरें।