सपनो की रेलगाड़ी पकड़कर,
एक तेज रफ्तार में कुछ यू बह गया,
जब खिड़की से बाहर देखा तो पता लगा,
की सपनो का शहर तो मिला, लेकिन मेरा घर काफी पीछे छूट गया।
गर्मी की छुट्टियों में अपने गाव तक का,
आज भी वो सफर याद आता है,
की बाबा उस चने वाले को रोकना,
कोई बच्चा जब अपने दादाजी से कह जाता है
कूलर ऐसी की इस आदत से, गर्मियों का तो मानो वो मौसम भी रूठ गया,
की सपनो का शहर तो मिला, लेकिन मेरा घर काफी पीछे छूट गया।
जब भी कभी घर अपने नानी के जाता था,
छोटी छोटी ख्वाहिशों का एक पिटारा साथ अपने ले जाता था,
नानी की घी वाली दाल, मामा से वो अम्बे लाल लाल,
हर किसी के माथे ख्वाहिशों का कुछ न कुछ हिस्सा जरूर आता था,
5 सितारा होटल की दावत के आगे, ननिहाल के सारे खाने का स्वाद भी छूट गया,
की सपनो का शहर तो मिला, लेकिन मेरा घर काफी पीछे छूट गया।
आज खयाल आया की इस दीवाली,
चलो घर नानी के चलते हैं
तेरे हिस्से की जिम्मेदारियों का क्या,
ये बात अक्सर मेरे सपने मुझसे कहते हैं
आज दीवाली में फाटकों की गूंज सुन ऐसा लगा, मानो की मेरे बचपन का वो गुब्बारा भी फुट गया,
की सपनो शहर तो मिला, लेकिन मेरा घर काफी पीछे छूट गया।