बंद आंखों के सपने

बंद आंखों के सपनों को, खुली नजरों की हकीकत से,
आज फिर छिपा लेंगे,
सपना है तो आखिर अपना ही, इसे फिर कभी निभा लेंगे।

अपने घर का बड़ा बने हुए,
हर उस बच्चे की खामोश आंखें,
ये बात चीख कर कह जाती है,
की जिम्मेदारियां कभी उम्र देख कर नहीं आती है,

खामोश आंखों में उस बेहतर कल की उम्मीद लिए, इन जिम्मेदारियों को भी उठा लेंगे
सपना है तो आखिर अपना ही, इसे फिर कभी निभा लेंगे।

आसान नहीं होता हर एक पड़ाव,
जो हर किसी को आसान लगता है,
क्योंकि मनचाही मंज़िल तक पहुंचने का रास्ता,
हर किसी को बराबर मुक़्क़ामल नही होता है,

बमुक़्क़मल इस अनचाहे रास्ते को भी, एक हसीन सफर बना लेंगे,
सपना है तो आखिर अपना ही, इसे फिर कभी निभा लेंगे।

यू तो सपनो की वो दुनिया लगती है,
हक़ीक़त के उजाले में एक नामंजूर मुराद सी,
जिम्मेदारियों की टूटी फर्श पर चलते हुए फिर भी मानो,
इन पैरों को अक्सर मिलती है उस दुनिया से कोई फरियाद सी,

इस फरियाद को सुन, उस दुनिया तक की फर्श खुद बना लेंगे,
सपना है तो आखिर अपना ही, इसे फिर कभी निभा लेंगे।

Published by chintamani shukla

CA by profession and a Poet by passion

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