इसलिए मै भी लिख लेता हुँ

जो शब्द न निकल सके जुबान से,
उन्हें मैं अपनी कलम से कह देता हु,
की यादों की लहरों को कोई किनारा मिल जाए,
इसलिए कभी कभार मैं भी लिख लेता हु।

मां बाबा की आंखों में जगमगाने वाली,
उम्मीद की हर किरण का सूरज मैं ही तो था,
लेकिन उनसे कभी ये नहीं कह पाया की,
कंधे बड़े जरूर थे मेरे पर दिल से मैं एक बच्चा ही तो था,

इस बच्चे की हर अधूरी ख्वाहिश को, अपनी ही आँखों में छुपा लेता हु,
और बस इसलिए कभी कभार मैं भी लिख लेता हु।

बयाने इश्क़ साझा करने को भी दो शब्द न मिले,
और ये इकतरफा प्यार आंसू बन मेरी आंखों से बह गया,
उस खुदा की रुकसाई का आलम तो देखो,
की कोई मेरे दिल को तो कोई इस दुनिया को ही छोड़ गया,

इन खाली पृष्ठों पर अनकहे अपने इस प्रेम का, अक्सर एक प्रतिमान गढ़ लेता हु,
और बस इसलिए कभी कभार मैं भी लिख लेता हु।

किसी ने पूछा की इतना बोझ क्यों लिए फिरते हो दिल में,
अपनी बांतों को इज़हार क्यों नहीं कर सकते,
मैंने कहा कई लोंगों की हिम्मत जो जुड़ी है मुझसे,
बस इसीलिए खुद को कमज़ोर भी तो नहीं कह सकते,

कही उनकी हिम्मत न टूट जा जाए, ये सोच खुद की बेकरारी दिल में ही दबा लेता हु,
और बस इसलिए कभी कभार मैं भी लिख लेता हु।

आज किसी पढ़ने वाले ने कहा मुझसे,
की पन्ने पर गिरी तुम्हारी हर स्याही में अर्थ ज़रा महरूम है,
मैने कहा जनाब हर चीज़ में अर्थ ढूंढ रहे हो,
लगता है जीवन के इस खेल में तुम्हारा तजुर्बा अभी जरा कम है,

इस खेल में लगातार शिकस्त के बीच, बस थोड़ा थोड़ा सा मैं जी लेता हुँ,
और बस इसलिए कभी कभार मैं भी लिख लेता हु।

Published by chintamani shukla

CA by profession and a Poet by passion

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