क्या चाहा था और क्या पाया है,
जीवन में मैं क्या करने निकाला था,
इसी कशमकश में आज रात फिर,
मैं बगल वाली सड़क पर टहलने निकला था।
कुछ कदम आगे उस सड़क पर,
नज़र मेरी एक नादान पर पड़ी,
कपड़े फटे थे, शरीर पर धूल थी,
चमका रहा था इक कार के शीशे को वो जो पास थी मेरे खड़ी,
कंधे पर हाथ रखकर उसके पूछा मैने,
की इतनी रात इस काम में क्या रखा है,
माथे से गिरते पसीने को पोछते हुए उसने कहा,
भइया आपने खा लिया, लेकिन मेरा परिवार अभी तक भूखा है,
अपने उन छोटे कंधों पर वो, लाखों उम्मीदों का संदूक ले निकल था,
इसी कशमकश में आज रात फिर,
मैं बगल वाली सड़क पर टहलने निकला था।
सर्द की रात में कुछ दूर चलते चलते,
मन में मेरे एक चाय का खयाल आया,
इसी खयाल में चलते चलते आगे मैने,
सायकल पर टंगी उस गर्म प्याली को पाया,
एक हाथ में प्याली, दूसरे हाथ में कुल्हड़,
मुस्कुराता हुआ वो शख्स शायद मेरा ही हमउम्र था,
चाय की चुस्की के साथ बयाने ज़िन्दगी साझा करते हुए ये बुझा,
की हमउम्र जरूर थे हम लेकिन ज़िन्दगी की कड़वी सच्चाई से मैं कितना महरूम था,
बमुक्कमल इस हकीकत को अपनाकर वो शख्स, ख्वाब अपने बुनने निकला था,
इसी कशमकश में आज रात फिर,
मैं बगल वाली सड़क पर टहलने निकला था।
चाय की आखिरी घूंट के साथ घर वापसी का खयाल आया,
और उस वक़्त मैने बस रिक्शा वाले एक चाचा को पाया,
अपने कांपते हाथों से चाचा ने मीटर गिराया,
और रिख्शे को उन्होंने मेरे घर की ओर घुमाया,
संकोच से ही सही लेकिन बड़ी हिम्मत से,
मैने उनसे पूछा की इस उम्र में इतनी मेहनत क्यों करनी है,
मुस्कुराकर आंखों के आंसू छुपाते हुए कहा उन्होंने,
क्या करू बेटा अपनी पोती की शादी जो करनी है।
घर तक का किराया था तो एक बून्द जितना, लेकिन वो बुढा शख्स इन्ही बूंदों से एक सागर भरने निकला था,
इसी कशमकश में आज रात फिर,
मैं बगल वाली सड़क पर टहलने निकला था।
चार मंजिला इमारत की सीढ़िया चढते हुए,
बीते कुछ पलों की तस्वीर मेरे सामने आती है,
इन तस्वीरों की कहानी याद कर अक्सर सोचता हु,
की ये ज़िन्दगी एक किताब क्यों नहीं बन जाती है
इस वक़्त से चुराकर आंखें हम,
जीवन में कुछ पल पीछे चले जाते,
मनचाहे पन्नो को जोड़कर हम सब,
अपने बिखरे हुए सपनों को फिर सजा पाते,
आज मिला हर एक वो शख्स शायद, जीवन के उन्हीं पन्नों को ढूंढने निकला था,
इसी कशमकश में आज रात फिर, मैं बगल वाली सड़क पर टहलने निकला था।