जानी पहचानी सी अनजान

दफ्तर का दिन था वो सोमवार का और उसके चेहरे पर एक सहमी हुई मुस्कान थी,
थे तो उस दिन पहली बार मिले हम, लेकिन वो लड़की कुछ जानी पहचानी सी अनजान थी,

बांतों बांतों में उसे बताया मैने कि,
इस दफ्तर में आगे का सफर संग मेरे तय करना है,
अपनी आँखों में उठ रहे सवालों के समंदर को बांध उसने कहा,
ठीक है बताओ अब आगे क्या करना है,

पहले दिन की वो छोटी सी मुलाक़ात, आगे लेने वाली एक खुशनसीब सा अंजाम थी,
थे तो उस दिन पहली बार मिले हम, लेकिन वो लड़की कुछ जानी पहचानी सी अनजान थी,

रोजमर्रा के उस कामकाज में,
उसकी और मेरी बातों का सिलसिला चलता गया,
इस हसीन सिलसिले के दौरान हम दोनों के बीच,
एक मासूम सी दोत्ती का धागा खुद ब खुद बुनता गया,

होने लगी थी उसकी बातें मेरे लिए खास अब, जो पहले शायद कुछ आम थी,
थे तो उस दिन पहली बार मिले हम, लेकिन वो लड़की कुछ जानी पहचानी सी अनजान थी,

अपने बिगड़े हालात को छिपाये,
मैं अक्सर संग दोस्तों के खूब हंसता था,
चाहे कितने भी बादल बरसे हो इस मन में लेकिन,
आँखों से इस बारिश को कभी न बहने देता था,

छलक गए कुछ आंसू एक दिन सामने उसके, समझ गयी वो मेरी जो दूसरी पहचान थी,
थे तो उस दिन पहली बार मिले हम, लेकिन वो लड़की कुछ जानी पहचानी सी अनजान थी,

बैठी थी एक दिन कुछ गुमसुम सी वो,
चेहरा भी उसका  थोड़ा सा उदास था,
देखकर यू उसको हो रही थी कुछ बेचैनी,
ऐसा लगा रहा था कि मानो मेरा रब मुझसे निराश था,

किया करिश्मा कुछ ऐसा इस कलम के शब्दों ने, लौट आयी फिर वो हंसी जो उसके चेहरे की पहचान थी,
थे तो उस दिन पहली बार मिले हम, लेकिन वो लड़की कुछ जानी पहचानी सी अनजान थी,

बैठा हु आज संग उसके ही मैं,
और ये दास्तान उसी को सुना रहा हु,
छोटी छोटी इन सारी यादों से ख़िलानेवाली,
बस उसी की हंसी को में देखता जा रहा हु,

रखना महरुम हर गम से उसको ऐ खुद, जैसे तेरी सोहबत हमेशा उसपर मेहरबान थी,
थे तो उस दिन पहली बार मिले हम, लेकिन वो लड़की कुछ जानी पहचानी सी अनजान थी,

Published by chintamani shukla

CA by profession and a Poet by passion

Leave a comment

Design a site like this with WordPress.com
Get started