क्यों सहमी है ये गालियां सारी,
कुदरत की रुकसाई का कैसा ये अंजाम है,
ढूंढ रहा हु चंद घंटो की मजदूरी कई दिनों से,
की मेरे घर का चुल्हा दो वक़्त की रोटी से अनजान है।
आँखों में उम्मीद और पेट की भूख लेकर,
तलाश मजदूरी की मैं आज फिर करने निकला था,
एक ठेस सी लगी फिर से सारी उम्मीदों पर,
शायद वो दाता कर्मठता पे ना मेरी पिघला था।
लौट आया मायूसी खाली हाथों में लेकर, जो शायद अब इस जीवन की पहचान है,
की मेरे घर का चुल्हा दो वक़्त की रोटी से अनजान है।
सुबह सवेरे हर रोज आंखे खुलते ही,
लेने खैरियत एक फोन मेरी माँ का आ जाता है,
जुबान तो नहीं कह पाती है कुछ भी लेकिन,
अपने लाल का भूखा पेट उस माँ से कहा छुप पाता है।
भांप लेती है वो मेरे मन की व्याकुलता, लेकिन इस वक़्त के आगे उसकी ममता भी वीरान है,
और मेरे घर का चुल्हा दो वक़्त की रोटी से अनजान है।
यहाँ से कोसो दूर मेरे दो बच्चे,
अपने स्कूल के फीस की आस लगाए बैठे हैं,
कैसे कर दु बयां उनसे हाल मैं अपनी लाचारी का,
मन ही मन वो मुझको खुदा जो बनाये बैठे हैं।
क्या दोष है उन मासूमो का, क्या उनके हिस्से में भी मेरी इस बदकिस्मती का अंजाम है,
और मेरे घर का चुल्हा दो वक़्त की रोटी से अनजान है।
हताश कदमो से मैने रास्ता अपने गांव का जब चुना,
रोका है सबने ने इन कदमो को कहकर की तुम नहीं जा सकते,
सुना था की आये हैं सात समंदर पार से लोग घर अपने,
फिर क्या हम चंद सड़कों के पार भी नहीं जा सकते।
लंबा है रास्ता फिर भी चल पड़ा हु, क्या देख पाऊंगा मेरे उन अपनो को जब तक ये जान है,
और मेरे घर का चुल्हा दो वक़्त की रोटी से अनजान है।