अनजाने से वीराने से खाली इस काले रास्ते पर, मैं ठेठ अकेला चलता हूं।
कुछ अलग सी मेरी मंज़िल है, जिसको मैं हर पल जीता हूं।
कोई हुनर नहीं कोई फिकर नहीं, मैं हु अपनी ही मस्ती में और खुद की ही मैं सुनता हू।
कोई अर्ज़ नहीं कोई शर्त नहीं, जीवन है ये मेरा और खुद दस्तूर मैं इसका लिखता हु।
चले जाऊं हर गांव शहर, लोग मुझको देखकर हंसते हैं,
बड़े सयानों की इस बस्ती में, क्यों मुझ जैसे लोग भी बसते हैं,
नहीं मिलेगा कोई साहिल दिशाहीन तेरी इन लहरों को,
मंजर मंजर हर गली गली लोग अक्सर मुझसे ये कहते हैं।
आजाद मेरे खयालों पे इन बातों का कोई ज़ोर नहीं, बाशिंदा उस मालिक का मैं खुद से अक्सर ये कहता हु,
जीवन है ये मेरा और खुद दस्तूर मैं इसका लिखता हु।
बेखौफी है फितरत मेरी, बेफिक्री है आदत मेरी,
क्यों तु मुझको पढ़ना चाहे, जो सोच नहीं है तेरी गहरी,
क्यों खुद को समझाऊं तुझे, क्यों खुद की बतलाऊँ तुझे,
कैसे परखेगा मेरे दिल को, जिसको परख ना पाया कोई जौहरी।
बयां करू जो मेरी हद तो, धरती के इस बिस्तर पे अम्बर के नीले चादर में मैं ख्वाब लेकर सोता हु,
जीवन है ये मेरा और खुद दस्तूर मैं इसका लिखता हु।
बिछा बेड़ियां रिवाज़ों की, रोका तुमने इन कदमों को,
होठों पे भी दे दी पाबंदी, की कह ना पाऊं अपनी इन नजमों को,
टूटेगी हर बेड़ी एकदिन हटेगी सारी पाबंदी भी,
लड़ूंगा जब उस अदालत में, मैं अपने हर इक मुकदमे को।
चलेगी गवाही इस दिल की बस, और दिल से मैं नाम खुदा का लेता हु,
जीवन है ये मेरा और खुद दस्तूर मैं इसका लिखता हु।