भूख से बिलखती, धूप में तड़पती,
हर उस बुझी सांस का, हिसाब मांगती हैं।
कसूर क्या था उनका, गुनाह कौन सा हुआ,
खून से सनी ये रोटियां, आज कुछ जवाब मांगती हैं।।
जिनके पसीने की बुनियाद पर, शहर की हर ईंट लगी थी,
उसी शहर की सहमी गलियों में, उनके बच्चों की चीख सुनी थी।
उन बच्चों का था क्या कसूर, आँखे उनकी एकटक ताकती हैं,
खून से सनी ये रोटियां, आज कुछ जवाब मांगती हैं।।
बेगाने हुए जब इस शहर में, चल दिए वो अपने नगर में,
गाड़ी ना घोड़ा न कोई साधन, जूते भी ना थे इस लंबे सफर में।
क्यों कुचले गए उनके कदम, क्या मौत भी गरीबी का भेद जानती है,
खून से सनी ये रोटियां, आज कुछ जवाब मांगती हैं।।
बस जाएगा ये देश फिर से, खिलेगी इसकी मुस्कान फिर से,
क्या लौटेगी कभी वो जिंदगी, दूर रह गयी जो अपने घर से,
क्यों कट गई बीच राह में ये, क्या ये बस इतनी ही कीमती हैं,
खून से सनी ये रोटियां, आज कुछ जवाब मांगती हैं।।