छूट गए कुछ मुकाम पीछे बामुक्कमल सफर में,
बज्म-ए-हयात के कुछ दस्तूर अभी और बाकी है,
झुकने ना दो इन नजरों से उम्मीदों का वो क्षितिज,
तसव्वुर की राह में कुछ कदम अभी और बाकी है।
माना की छूट गया इन हांथों से,
मुरादों का वो महल रेत बनकर,
और बिखर गयी है उम्मीदें कुछ,
जली राख सी अवशेष बनकर।
इस बुझी राख में भी, कुछ बूँद आग की अभी और बाकी है,
की झुकने ना दो नजरों से उम्मीदों का वो क्षितिज, तसव्वुर की राह में कुछ कदम अभी और बाकी है।
एक अजीब रंजिश है तिमिर से,
आजकल रूठा भी कुछ मेहताब है,
लेकिन एक नई रोशनी समेटे,
चंद दूरी पे बैठा वो आफताब है।
कह दो तिमिर से की इस रंजिश के, पल अब चंद बाकी है,
की झुकने ना दो नजरों से उम्मीदों का वो क्षितिज, तसव्वुर की राह में कुछ कदम अभी और बाकी है।