क्या मैं खुद को जानता हु

आईने में रोज़ खुद को, घंटों खड़े निहारता हु,
क्या मैं बस खुद को छोड़, हर किसी को जानता हु।

आईना भी अब लगे है, थोड़ा सा कुछ मजबूर सा,
क्या दिखाए सोचता है, कोई पहलू तस्वीर का,
हर पहलू है दस्तूर कोई, सहमा खड़ा विचरता हु,
क्या मैं बस खुद को छोड़, हर किसी को जानता हु।

फैली है स्याही बेखबर, कुछ उलझे हुए खयाल सी,
मिलता ना कोई छोर इसका, करती है कोई सवाल सी,
इस सवाल से दूर कोसों, अपने मन को लिए भागता हु,
क्या मैं बस खुद को छोड़, हर किसी को जानता हु।

बिखरी हुई किताब में, औरों के कुछ जवाब में,
खोजता हु खुद को मैं, अक्सर किसी हिजाब में,
ढूंढता हु न जाने क्या, जो अक्सर खुद को खंगालता हु,
क्या मैं बस खुद को छोड़, हर किसी को जानता हु।

Published by chintamani shukla

CA by profession and a Poet by passion

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