बीती रात के ख्वाब में, इत्तेफाक एक बात हुई,
अतीत की उन गलियों में, मेरी मुझसे ही मुलाक़ात हुई।
पूछ बैठा मेरा अक्स मुझसे, खो दिया है तुमने मुझको कहाँ,
चेहरे पर लिए कुछ अजब बेचैनी, दर ब दर फिरते हो कहाँ,
कहा था जल्द ही लौटोगे, तो देर किस बात की हुई,
अतीत की उन गलियों में आज, मेरी मुझसे ही मुलाक़ात हुई।
कागज़ की नाव चलाई थी तुमने, बरसात के बहते पानी में,
झूम उठी थी नज़रे कैसे, उन बहती मौजों की रवानी में,
कागज़ कोरा वही आज है, और बरसात वही आज भी हुई,
अतीत की उन गलियों में आज, मेरी मुझसे ही मुलाक़ात हुई।
बरसों से जो सहमा पड़ा है, शख्स तो तुम आज भी वही हो,
समझते हो खुद को भीड़ का हिस्सा, अपना तो पूरा संसार तुम ही हो,
खुद को यू भुलाकर खुद से ही, ये रंजिश किस बात की हुई,
अतीत की उन गलियों में आज, मेरी मुझसे ही मुलाक़ात हुई।