जहन-ऐ-जमीन के दो गज कोने में,
खाक अतीत तले जिसको दफनाया है,
चीख उठी है ये खामोशी फिर से,
जो गुजर गया क्या वो मेरा ही साया है।
अंजुली में भी खाक भरी थी
जब उन तारों को ललकारा था,
हाँ देखा था मैने भी एक सपना,
शायद यही कसूर हमारा था।
ना ख्वाब बचा ना ललकार बची,
इस वक्त ने कैदे किस्मत फरमाया है,
की चीख उठी है ये खामोशी फिर से,
जो गुजर गया क्या वो मेरा ही साया है।
है करती कई सवाल ये खामोशी,
और करती रोज वकालत है,
किस्मत और इस खामोशी में,
रोज छिड़ती एक अदालत है।
करू फैसला किसके हक में,
आँखों में एक असमंजस सा छाया है,
की चीख उठी है ये खामोशी फिर से,
जो गुजर गया क्या वो मेरा ही साया है।
जाग उठी है ये स्याही फिर से,
फिर से कोरे कागज पे बह जाना है,
कागज कलम की इस जोड़ी का,
मेरी खामोशी से एक रिश्ता बढ़ा पुराना है।
जहन में उठती इन लहरों को,
अक्सर अपनी स्याही से दफनाया है,
की चीख उठी है ये खामोशी फिर से,
जो गुजर गया क्या वो मेरा ही साया है।