जहन-ऐ-जमीन के दो गज कोने में,खाक अतीत तले जिसको दफनाया है,चीख उठी है ये खामोशी फिर से,जो गुजर गया क्या वो मेरा ही साया है। अंजुली में भी खाक भरी थीजब उन तारों को ललकारा था,हाँ देखा था मैने भी एक सपना,शायद यही कसूर हमारा था। ना ख्वाब बचा ना ललकार बची,इस वक्त ने कैदेContinue reading “चीख खामोशी की”
Author Archives: chintamani shukla
क्या मैं खुद को जानता हु
आईने में रोज़ खुद को, घंटों खड़े निहारता हु,क्या मैं बस खुद को छोड़, हर किसी को जानता हु। आईना भी अब लगे है, थोड़ा सा कुछ मजबूर सा,क्या दिखाए सोचता है, कोई पहलू तस्वीर का,हर पहलू है दस्तूर कोई, सहमा खड़ा विचरता हु,क्या मैं बस खुद को छोड़, हर किसी को जानता हु। फैलीContinue reading “क्या मैं खुद को जानता हु”
मुरझाये ख्वाब
ना कुरेदो इस बुझी राख को,दफन इसमे कई जज़्बात मिलेंगे,ना सींचो यादों की इस बंजर भूमी को,जिसमे बस मुरझाए से ख्वाब मिलेंगे। आँखें खोले बाहें मोड़,रातों का ढलना सीख लिया है,बिना सितारों के इस अम्बर में,ओझल सा रहना सीख लिया है। सुने से इस अम्बर में भी, शोकों के कई तादाद मिलेंगे,कि ना सींचो यादोंContinue reading “मुरझाये ख्वाब”
मेरी मुझसे मुलाक़ात
बीती रात के ख्वाब में, इत्तेफाक एक बात हुई,अतीत की उन गलियों में, मेरी मुझसे ही मुलाक़ात हुई। पूछ बैठा मेरा अक्स मुझसे, खो दिया है तुमने मुझको कहाँ,चेहरे पर लिए कुछ अजब बेचैनी, दर ब दर फिरते हो कहाँ,कहा था जल्द ही लौटोगे, तो देर किस बात की हुई,अतीत की उन गलियों में आज,Continue reading “मेरी मुझसे मुलाक़ात”
कुछ कदम अभी और बाकी है
छूट गए कुछ मुकाम पीछे बामुक्कमल सफर में,बज्म-ए-हयात के कुछ दस्तूर अभी और बाकी है,झुकने ना दो इन नजरों से उम्मीदों का वो क्षितिज,तसव्वुर की राह में कुछ कदम अभी और बाकी है। माना की छूट गया इन हांथों से,मुरादों का वो महल रेत बनकर,और बिखर गयी है उम्मीदें कुछ,जली राख सी अवशेष बनकर। इसContinue reading “कुछ कदम अभी और बाकी है”
रोटियां जवाब मांगती हैं
भूख से बिलखती, धूप में तड़पती,हर उस बुझी सांस का, हिसाब मांगती हैं।कसूर क्या था उनका, गुनाह कौन सा हुआ,खून से सनी ये रोटियां, आज कुछ जवाब मांगती हैं।। जिनके पसीने की बुनियाद पर, शहर की हर ईंट लगी थी,उसी शहर की सहमी गलियों में, उनके बच्चों की चीख सुनी थी।उन बच्चों का था क्याContinue reading “रोटियां जवाब मांगती हैं”
खुद दस्तूर मैं अपना लिखता हूं
अनजाने से वीराने से खाली इस काले रास्ते पर, मैं ठेठ अकेला चलता हूं।कुछ अलग सी मेरी मंज़िल है, जिसको मैं हर पल जीता हूं।कोई हुनर नहीं कोई फिकर नहीं, मैं हु अपनी ही मस्ती में और खुद की ही मैं सुनता हू।कोई अर्ज़ नहीं कोई शर्त नहीं, जीवन है ये मेरा और खुद दस्तूरContinue reading “खुद दस्तूर मैं अपना लिखता हूं”
मेरे घर का चुल्हा
क्यों सहमी है ये गालियां सारी,कुदरत की रुकसाई का कैसा ये अंजाम है,ढूंढ रहा हु चंद घंटो की मजदूरी कई दिनों से,की मेरे घर का चुल्हा दो वक़्त की रोटी से अनजान है। आँखों में उम्मीद और पेट की भूख लेकर,तलाश मजदूरी की मैं आज फिर करने निकला था,एक ठेस सी लगी फिर से सारीContinue reading “मेरे घर का चुल्हा”
आखों से गुफ़्तगू
कुछ अनकही तो कुछ अनसुनी,कुछ बातें आज बस कहनी और सुननी है,की खामोश हो जा ऐ जुबान आज तू,मेरे दिल को इन आँखों से थोड़ी सी गुफ़्तगू करनी है। सच कहूँ तो ये आंखे हमेशा,मेरे दिल की मुरादों की तस्वीर बन जाती है,धुंधली हो जाती है ये तस्वीर भी ऐ जुबान अक्सर,जब भी कभी तूContinue reading “आखों से गुफ़्तगू”
जानी पहचानी सी अनजान
दफ्तर का दिन था वो सोमवार का और उसके चेहरे पर एक सहमी हुई मुस्कान थी,थे तो उस दिन पहली बार मिले हम, लेकिन वो लड़की कुछ जानी पहचानी सी अनजान थी, बांतों बांतों में उसे बताया मैने कि,इस दफ्तर में आगे का सफर संग मेरे तय करना है,अपनी आँखों में उठ रहे सवालों केContinue reading “जानी पहचानी सी अनजान”