चीख खामोशी की
जहन-ऐ-जमीन के दो गज कोने में,
खाक अतीत तले जिसको दफनाया है,
चीख उठी है ये खामोशी फिर से,
जो गुजर गया क्या वो मेरा ही साया है।
अंजुली में भी खाक भरी थी
जब उन तारों को ललकारा था,
हाँ देखा था मैने भी एक सपना,
शायद यही कसूर हमारा था।
ना ख्वाब बचा ना ललकार बची,
इस वक्त ने कैदे किस्मत फरमाया है,
की चीख उठी है ये खामोशी फिर से,
जो गुजर गया क्या वो मेरा ही साया है।
है करती कई सवाल ये खामोशी,
और करती रोज वकालत है,
किस्मत और इस खामोशी में,
रोज छिड़ती एक अदालत है।
करू फैसला किसके हक में,
आँखों में एक असमंजस सा छाया है,
की चीख उठी है ये खामोशी फिर से,
जो गुजर गया क्या वो मेरा ही साया है।
जाग उठी है ये स्याही फिर से,
फिर से कोरे कागज पे बह जाना है,
कागज कलम की इस जोड़ी का,
मेरी खामोशी से एक रिश्ता बढ़ा पुराना है।
जहन में उठती इन लहरों को,
अक्सर अपनी स्याही से दफनाया है,
की चीख उठी है ये खामोशी फिर से,
जो गुजर गया क्या वो मेरा ही साया है।
क्या मैं खुद को जानता हु
आईने में रोज़ खुद को, घंटों खड़े निहारता हु,
क्या मैं बस खुद को छोड़, हर किसी को जानता हु।
आईना भी अब लगे है, थोड़ा सा कुछ मजबूर सा,
क्या दिखाए सोचता है, कोई पहलू तस्वीर का,
हर पहलू है दस्तूर कोई, सहमा खड़ा विचरता हु,
क्या मैं बस खुद को छोड़, हर किसी को जानता हु।
फैली है स्याही बेखबर, कुछ उलझे हुए खयाल सी,
मिलता ना कोई छोर इसका, करती है कोई सवाल सी,
इस सवाल से दूर कोसों, अपने मन को लिए भागता हु,
क्या मैं बस खुद को छोड़, हर किसी को जानता हु।
बिखरी हुई किताब में, औरों के कुछ जवाब में,
खोजता हु खुद को मैं, अक्सर किसी हिजाब में,
ढूंढता हु न जाने क्या, जो अक्सर खुद को खंगालता हु,
क्या मैं बस खुद को छोड़, हर किसी को जानता हु।
मुरझाये ख्वाब
ना कुरेदो इस बुझी राख को,
दफन इसमे कई जज़्बात मिलेंगे,
ना सींचो यादों की इस बंजर भूमी को,
जिसमे बस मुरझाए से ख्वाब मिलेंगे।
आँखें खोले बाहें मोड़,
रातों का ढलना सीख लिया है,
बिना सितारों के इस अम्बर में,
ओझल सा रहना सीख लिया है।
सुने से इस अम्बर में भी, शोकों के कई तादाद मिलेंगे,
कि ना सींचो यादों की इस बंजर भूमी को, जिसमे बस मुरझाए से ख्वाब मिलेंगे।
कुछ हलचल सी थी इन यादों में,
एक अरसे से वो भी खामोश है,
बेसुध हैं सारे जज़्बात कहीं,
मैं खुद मुझ में बेहोश है।
मत जगाओ इस बेहोशी से, अनकहे कई इज़हार मिलेंगे,
कि ना सींचो यादों की इस बंजर भूमी को, जिसमे बस मुरझाए से ख्वाब मिलेंगे।
खत्म हुई है गुंजाइश अब,
उठ के फिर से चलने की,
कुछ अपने मन की कहने की,
कुछ तुमसे मन की सुनने की।
मत भेजो स्याही को कलम तक, कागज़ पर बिखरे कुछ अल्फ़ाज़ मिलेंगे,
कि ना सींचो यादों की इस बंजर भूमी को, जिसमे बस मुरझाए से ख्वाब मिलेंगे।
मेरी मुझसे मुलाक़ात
बीती रात के ख्वाब में, इत्तेफाक एक बात हुई,
अतीत की उन गलियों में, मेरी मुझसे ही मुलाक़ात हुई।
पूछ बैठा मेरा अक्स मुझसे, खो दिया है तुमने मुझको कहाँ,
चेहरे पर लिए कुछ अजब बेचैनी, दर ब दर फिरते हो कहाँ,
कहा था जल्द ही लौटोगे, तो देर किस बात की हुई,
अतीत की उन गलियों में आज, मेरी मुझसे ही मुलाक़ात हुई।
कागज़ की नाव चलाई थी तुमने, बरसात के बहते पानी में,
झूम उठी थी नज़रे कैसे, उन बहती मौजों की रवानी में,
कागज़ कोरा वही आज है, और बरसात वही आज भी हुई,
अतीत की उन गलियों में आज, मेरी मुझसे ही मुलाक़ात हुई।
बरसों से जो सहमा पड़ा है, शख्स तो तुम आज भी वही हो,
समझते हो खुद को भीड़ का हिस्सा, अपना तो पूरा संसार तुम ही हो,
खुद को यू भुलाकर खुद से ही, ये रंजिश किस बात की हुई,
अतीत की उन गलियों में आज, मेरी मुझसे ही मुलाक़ात हुई।
कुछ कदम अभी और बाकी है
छूट गए कुछ मुकाम पीछे बामुक्कमल सफर में,
बज्म-ए-हयात के कुछ दस्तूर अभी और बाकी है,
झुकने ना दो इन नजरों से उम्मीदों का वो क्षितिज,
तसव्वुर की राह में कुछ कदम अभी और बाकी है।
माना की छूट गया इन हांथों से,
मुरादों का वो महल रेत बनकर,
और बिखर गयी है उम्मीदें कुछ,
जली राख सी अवशेष बनकर।
इस बुझी राख में भी, कुछ बूँद आग की अभी और बाकी है,
की झुकने ना दो नजरों से उम्मीदों का वो क्षितिज, तसव्वुर की राह में कुछ कदम अभी और बाकी है।
एक अजीब रंजिश है तिमिर से,
आजकल रूठा भी कुछ मेहताब है,
लेकिन एक नई रोशनी समेटे,
चंद दूरी पे बैठा वो आफताब है।
कह दो तिमिर से की इस रंजिश के, पल अब चंद बाकी है,
की झुकने ना दो नजरों से उम्मीदों का वो क्षितिज, तसव्वुर की राह में कुछ कदम अभी और बाकी है।
रोटियां जवाब मांगती हैं
भूख से बिलखती, धूप में तड़पती,
हर उस बुझी सांस का, हिसाब मांगती हैं।
कसूर क्या था उनका, गुनाह कौन सा हुआ,
खून से सनी ये रोटियां, आज कुछ जवाब मांगती हैं।।
जिनके पसीने की बुनियाद पर, शहर की हर ईंट लगी थी,
उसी शहर की सहमी गलियों में, उनके बच्चों की चीख सुनी थी।
उन बच्चों का था क्या कसूर, आँखे उनकी एकटक ताकती हैं,
खून से सनी ये रोटियां, आज कुछ जवाब मांगती हैं।।
बेगाने हुए जब इस शहर में, चल दिए वो अपने नगर में,
गाड़ी ना घोड़ा न कोई साधन, जूते भी ना थे इस लंबे सफर में।
क्यों कुचले गए उनके कदम, क्या मौत भी गरीबी का भेद जानती है,
खून से सनी ये रोटियां, आज कुछ जवाब मांगती हैं।।
बस जाएगा ये देश फिर से, खिलेगी इसकी मुस्कान फिर से,
क्या लौटेगी कभी वो जिंदगी, दूर रह गयी जो अपने घर से,
क्यों कट गई बीच राह में ये, क्या ये बस इतनी ही कीमती हैं,
खून से सनी ये रोटियां, आज कुछ जवाब मांगती हैं।।
खुद दस्तूर मैं अपना लिखता हूं
अनजाने से वीराने से खाली इस काले रास्ते पर, मैं ठेठ अकेला चलता हूं।
कुछ अलग सी मेरी मंज़िल है, जिसको मैं हर पल जीता हूं।
कोई हुनर नहीं कोई फिकर नहीं, मैं हु अपनी ही मस्ती में और खुद की ही मैं सुनता हू।
कोई अर्ज़ नहीं कोई शर्त नहीं, जीवन है ये मेरा और खुद दस्तूर मैं इसका लिखता हु।
चले जाऊं हर गांव शहर, लोग मुझको देखकर हंसते हैं,
बड़े सयानों की इस बस्ती में, क्यों मुझ जैसे लोग भी बसते हैं,
नहीं मिलेगा कोई साहिल दिशाहीन तेरी इन लहरों को,
मंजर मंजर हर गली गली लोग अक्सर मुझसे ये कहते हैं।
आजाद मेरे खयालों पे इन बातों का कोई ज़ोर नहीं, बाशिंदा उस मालिक का मैं खुद से अक्सर ये कहता हु,
जीवन है ये मेरा और खुद दस्तूर मैं इसका लिखता हु।
बेखौफी है फितरत मेरी, बेफिक्री है आदत मेरी,
क्यों तु मुझको पढ़ना चाहे, जो सोच नहीं है तेरी गहरी,
क्यों खुद को समझाऊं तुझे, क्यों खुद की बतलाऊँ तुझे,
कैसे परखेगा मेरे दिल को, जिसको परख ना पाया कोई जौहरी।
बयां करू जो मेरी हद तो, धरती के इस बिस्तर पे अम्बर के नीले चादर में मैं ख्वाब लेकर सोता हु,
जीवन है ये मेरा और खुद दस्तूर मैं इसका लिखता हु।
बिछा बेड़ियां रिवाज़ों की, रोका तुमने इन कदमों को,
होठों पे भी दे दी पाबंदी, की कह ना पाऊं अपनी इन नजमों को,
टूटेगी हर बेड़ी एकदिन हटेगी सारी पाबंदी भी,
लड़ूंगा जब उस अदालत में, मैं अपने हर इक मुकदमे को।
चलेगी गवाही इस दिल की बस, और दिल से मैं नाम खुदा का लेता हु,
जीवन है ये मेरा और खुद दस्तूर मैं इसका लिखता हु।
मेरे घर का चुल्हा
क्यों सहमी है ये गालियां सारी,
कुदरत की रुकसाई का कैसा ये अंजाम है,
ढूंढ रहा हु चंद घंटो की मजदूरी कई दिनों से,
की मेरे घर का चुल्हा दो वक़्त की रोटी से अनजान है।
आँखों में उम्मीद और पेट की भूख लेकर,
तलाश मजदूरी की मैं आज फिर करने निकला था,
एक ठेस सी लगी फिर से सारी उम्मीदों पर,
शायद वो दाता कर्मठता पे ना मेरी पिघला था।
लौट आया मायूसी खाली हाथों में लेकर, जो शायद अब इस जीवन की पहचान है,
की मेरे घर का चुल्हा दो वक़्त की रोटी से अनजान है।
सुबह सवेरे हर रोज आंखे खुलते ही,
लेने खैरियत एक फोन मेरी माँ का आ जाता है,
जुबान तो नहीं कह पाती है कुछ भी लेकिन,
अपने लाल का भूखा पेट उस माँ से कहा छुप पाता है।
भांप लेती है वो मेरे मन की व्याकुलता, लेकिन इस वक़्त के आगे उसकी ममता भी वीरान है,
और मेरे घर का चुल्हा दो वक़्त की रोटी से अनजान है।
यहाँ से कोसो दूर मेरे दो बच्चे,
अपने स्कूल के फीस की आस लगाए बैठे हैं,
कैसे कर दु बयां उनसे हाल मैं अपनी लाचारी का,
मन ही मन वो मुझको खुदा जो बनाये बैठे हैं।
क्या दोष है उन मासूमो का, क्या उनके हिस्से में भी मेरी इस बदकिस्मती का अंजाम है,
और मेरे घर का चुल्हा दो वक़्त की रोटी से अनजान है।
हताश कदमो से मैने रास्ता अपने गांव का जब चुना,
रोका है सबने ने इन कदमो को कहकर की तुम नहीं जा सकते,
सुना था की आये हैं सात समंदर पार से लोग घर अपने,
फिर क्या हम चंद सड़कों के पार भी नहीं जा सकते।
लंबा है रास्ता फिर भी चल पड़ा हु, क्या देख पाऊंगा मेरे उन अपनो को जब तक ये जान है,
और मेरे घर का चुल्हा दो वक़्त की रोटी से अनजान है।
आखों से गुफ़्तगू
कुछ अनकही तो कुछ अनसुनी,
कुछ बातें आज बस कहनी और सुननी है,
की खामोश हो जा ऐ जुबान आज तू,
मेरे दिल को इन आँखों से थोड़ी सी गुफ़्तगू करनी है।
सच कहूँ तो ये आंखे हमेशा,
मेरे दिल की मुरादों की तस्वीर बन जाती है,
धुंधली हो जाती है ये तस्वीर भी ऐ जुबान अक्सर,
जब भी कभी तू किसी और की उम्मीदों से समझौता कर जाती है।
खड़ा हु सामने आईने के आज मैं, मुझे ये तस्वीर देखनी है,
की खामोश हो जा ऐ जुबान आज तू,
मेरे दिल को इन आँखों से थोड़ी सी गुफ़्तगू करनी है।
अक्सर बिना किसी शब्द के ये आंखें,
कुछ हाले दिल बयां कर जाती है,
नहीं समझ पाते कुछ लोग इस खामोशी को,
उनके लिए तो मेरी आंखे मेरी जुबान से मेल नहीं खाती हैं
ऐसे ही किसी खास शख्स को आज, कुछ बांते बस नज़रों से कहनी है,
की खामोश हो जा ऐ जुबान आज तू, मेरे दिल को इन आँखों से थोड़ी सी गुफ़्तगू करनी है।
तन्हा हर मोड़ पर इस दिल के लिए,
ये आंखे ही हमदम एक हमसफर बन जाती है,
भीग जाती है थोड़ी सी कुछ उदासी में ये,
और किसी हसीन सपने से अक्सर इस दिल को हंसाती है,
दे दे चंद पल का समय आज कुछ, इस टूटे रिश्ते की कड़ी मुझे फिर से जोड़नी है,
की खामोश हो जा ऐ जुबान आज तू, मेरे दिल को इन आँखों से थोड़ी सी गुफ़्तगू करनी है।
जानी पहचानी सी अनजान
दफ्तर का दिन था वो सोमवार का और उसके चेहरे पर एक सहमी हुई मुस्कान थी,
थे तो उस दिन पहली बार मिले हम, लेकिन वो लड़की कुछ जानी पहचानी सी अनजान थी,
बांतों बांतों में उसे बताया मैने कि,
इस दफ्तर में आगे का सफर संग मेरे तय करना है,
अपनी आँखों में उठ रहे सवालों के समंदर को बांध उसने कहा,
ठीक है बताओ अब आगे क्या करना है,
पहले दिन की वो छोटी सी मुलाक़ात, आगे लेने वाली एक खुशनसीब सा अंजाम थी,
थे तो उस दिन पहली बार मिले हम, लेकिन वो लड़की कुछ जानी पहचानी सी अनजान थी,
रोजमर्रा के उस कामकाज में,
उसकी और मेरी बातों का सिलसिला चलता गया,
इस हसीन सिलसिले के दौरान हम दोनों के बीच,
एक मासूम सी दोत्ती का धागा खुद ब खुद बुनता गया,
होने लगी थी उसकी बातें मेरे लिए खास अब, जो पहले शायद कुछ आम थी,
थे तो उस दिन पहली बार मिले हम, लेकिन वो लड़की कुछ जानी पहचानी सी अनजान थी,
अपने बिगड़े हालात को छिपाये,
मैं अक्सर संग दोस्तों के खूब हंसता था,
चाहे कितने भी बादल बरसे हो इस मन में लेकिन,
आँखों से इस बारिश को कभी न बहने देता था,
छलक गए कुछ आंसू एक दिन सामने उसके, समझ गयी वो मेरी जो दूसरी पहचान थी,
थे तो उस दिन पहली बार मिले हम, लेकिन वो लड़की कुछ जानी पहचानी सी अनजान थी,
बैठी थी एक दिन कुछ गुमसुम सी वो,
चेहरा भी उसका थोड़ा सा उदास था,
देखकर यू उसको हो रही थी कुछ बेचैनी,
ऐसा लगा रहा था कि मानो मेरा रब मुझसे निराश था,
किया करिश्मा कुछ ऐसा इस कलम के शब्दों ने, लौट आयी फिर वो हंसी जो उसके चेहरे की पहचान थी,
थे तो उस दिन पहली बार मिले हम, लेकिन वो लड़की कुछ जानी पहचानी सी अनजान थी,
बैठा हु आज संग उसके ही मैं,
और ये दास्तान उसी को सुना रहा हु,
छोटी छोटी इन सारी यादों से ख़िलानेवाली,
बस उसी की हंसी को में देखता जा रहा हु,
रखना महरुम हर गम से उसको ऐ खुद, जैसे तेरी सोहबत हमेशा उसपर मेहरबान थी,
थे तो उस दिन पहली बार मिले हम, लेकिन वो लड़की कुछ जानी पहचानी सी अनजान थी,