क्यों नहीं मिलता सुकून अब किसी भी मुकाम पर,
ये सवाल आज हम इस खामोश दिल से पूछते हैं,
की ख्वाहिशों की चकाचौंध भरी इस दुनिया में,
चलो आज हम खुद को ढूंढते हैं।
शुरू हुआ था स्कूल के छोटे बस्ते से जो,
उम्मीदों का वो सिलसिला अभी तक चलता आ रहा है,
बन गया है सपनों का एक पिटारा वो छोटा सा बस्ता अब,
हर पल जो किसी अपने की ख्वाहिशों से भरता जा रहा है।
क्या कोई ख्वाहिश मेरे होठों को भी छू जाएगी, बैठ अकेले अक्सर हम ये सोचते हैं,
की ख्वाहिशों की चकाचौंध भरी इस दुनिया में, चलो आज हम खुद को ढूंढते हैं।
सुना था किस्से कहानियों में हमने भी,
की इंसान की इच्छा उसे अंदर से आवाज़ देती है,
सोचता हु की करवा लू इलाज़ अपने इन कानों का मैं,
क्यूंकि मुझे ये आवाज़ सुनाई नहीं देती है।
इस मन के सूरज की रोशनी में हम, आज अपनी इच्छा के अस्तित्त्व को सोचते है,
की ख्वाहिशों की चकाचौंध भरी इस दुनिया में, चलो आज हम खुद को ढूंढते हैं।
कुछ यू बन गई है ये ज़िन्दगी,
एक चौपडी फायदे और नुकसान की,
अब तो इसमे रत्ती भर भी जगह नही है,
खुद अपने ही मुस्कान की।
इस चौपडी का एक पन्ना चलो, हम अपनी मुस्कान के लिए छोड़ते हैं,
की ख्वाहिशों की चकाचौंध भरी इस दुनिया में, चलो आज हम खुद को ढूंढते हैं।
कुछ अपनों के तो कुछ गैरों के,
ख्वाब हमने सभी के पूरे किये,
लेकिन ऐ ज़िन्दगी एक अरसा सा हो गया है,
हम खुद के लिए चंद पल भी नहीं जिये,
कुछ पल चुराकर इस ज़िन्दगी से आज, हम खुद को खुदी से जीतते हैं,
की ख्वाहिशों की चकाचौंध भरी इस दुनिया में, चलो आज हम खुद को ढूंढते हैं।